नई दिल्ली, 21 अगस्त 2026: भारत में चीनी की कीमतों में हाल के दिनों में तेज बढ़ोतरी ने सरकार, चीनी उद्योग और उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। अगस्त 2026 में घरेलू बाजार में चीनी के दाम रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गए हैं। महाराष्ट्र के प्रमुख बाजार कोल्हापुर में थोक कीमत अगस्त की शुरुआत से करीब 20% बढ़कर लगभग ₹5,350 प्रति क्विंटल पहुंच गई, जबकि उत्तर प्रदेश में 18 अगस्त को कुछ ग्रेड की एक्स-मिल कीमत करीब ₹5,400 प्रति क्विंटल दर्ज की गई।
कीमतों में इस तेजी के पीछे केवल एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि कम चीनी उत्पादन, कमजोर/अनियमित बारिश, घटते शुरुआती स्टॉक, त्योहारी मांग और बाजार में सीमित उपलब्धता जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं।
चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
चीनी बाजार में इस समय मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बिगड़ता दिखाई दे रहा है। 2025-26 सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 27.9 मिलियन टन लगाया गया है, जबकि घरेलू खपत करीब 28.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है। इससे अगले सीजन की शुरुआत में उपलब्ध शुरुआती स्टॉक काफी कम रहने की आशंका है।
इसके अलावा महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम और बारिश से जुड़ी समस्याओं ने उत्पादन की चिंता बढ़ाई है। त्योहारी सीजन में मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने से कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
एथेनॉल का चीनी कीमतों पर क्या असर पड़ा?
एथेनॉल प्रभाव — अलग से
भारत की एथेनॉल-ब्लेंडिंग नीति का उद्देश्य पेट्रोल में एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना और किसानों तथा चीनी मिलों के लिए वैकल्पिक बाजार तैयार करना है। सरकार का Ethanol Blended Petrol कार्यक्रम इसी दिशा में है।
चीनी उद्योग में गन्ने के रस और B-heavy molasses जैसे फीडस्टॉक को एथेनॉल बनाने में डायवर्ट करने से वह मात्रा चीनी उत्पादन में नहीं आती। Reuters के अनुसार मौजूदा सीजन में लगभग 3 मिलियन टन चीनी के बराबर उत्पादन को एथेनॉल की ओर डायवर्ट किया गया है। ऐसे समय में जब चीनी उत्पादन पहले से दबाव में है, यह डायवर्जन घरेलू बाजार में उपलब्ध चीनी को कम कर सकता है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी की मौजूदा महंगाई केवल एथेनॉल नीति के कारण है। कम गन्ना उत्पादन, मौसम, कम स्टॉक, त्योहारी मांग और बाजार की आपूर्ति स्थिति भी महत्वपूर्ण कारण हैं। उद्योग रिपोर्टों के मुताबिक ऊंची चीनी कीमतों के कारण अब मिलों के लिए चीनी बेचना कुछ परिस्थितियों में एथेनॉल उत्पादन से अधिक आकर्षक हो सकता है।
सरकार एथेनॉल डायवर्जन पर क्या कर सकती है?
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार आगामी 2026-27 सीजन में गन्ने के एथेनॉल डायवर्जन को सीमित करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित विकल्पों में चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देना और एथेनॉल के लिए मुख्य रूप से C-heavy molasses का इस्तेमाल करना शामिल है। साथ ही, पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को बनाए रखने के लिए मक्का और चावल जैसे दूसरे फीडस्टॉक के इस्तेमाल की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
इसका अर्थ यह है कि सरकार एथेनॉल नीति को पूरी तरह खत्म करने के बजाय चीनी की उपलब्धता और ईंधन नीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है।
सरकार ने उठाए कई बड़े कदम
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने पहले चीनी डीलरों पर स्टॉक होल्डिंग सीमा लागू की थी। 1 अगस्त से लागू इस व्यवस्था का उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी को रोकना तथा बाजार में नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
अब सरकार ने बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए भी स्टॉक रखने की अवधि घटाकर 15 दिन करने का फैसला किया है। 10 टन से अधिक मासिक खपत वाले संस्थागत खरीदारों पर यह सीमा लागू होगी।
सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक 1 मिलियन मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति है। यह व्यवस्था 31 अक्टूबर 2026 तक प्रभावी रहेगी और इसका उद्देश्य त्योहारी सीजन से पहले घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना है।
आम उपभोक्ता पर क्या असर पड़ेगा?
चीनी की कीमतों में लगातार तेजी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है। इसके अलावा मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ, आइसक्रीम और अन्य चीनी-आधारित खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
त्योहारी सीजन के दौरान इसका प्रभाव ज्यादा दिखाई दे सकता है क्योंकि इस अवधि में चीनी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ती है। हालांकि, शुल्क-मुक्त आयात और सरकार की स्टॉक सीमा जैसे उपायों से आने वाले समय में बाजार में आपूर्ति बढ़ने पर कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है।
चीनी किसानों और मिलों के लिए क्या मायने हैं?
ऊंची चीनी कीमतें चीनी मिलों की बिक्री प्राप्ति और मार्जिन को बेहतर कर सकती हैं। दूसरी ओर, सरकार द्वारा कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आयात, स्टॉक सीमा या बिक्री संबंधी नियमों में बदलाव किए जाने से मिलों की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
गन्ना किसानों के लिए 2026-27 सीजन का Fair and Remunerative Price (FRP) ₹365 प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो 10.25% की बेसिक रिकवरी दर पर लागू है।
आगे चीनी के दाम किस दिशा में जाएंगे?
अगले कुछ महीनों में तीन कारक सबसे महत्वपूर्ण रहेंगे—नई गन्ना फसल का उत्पादन, घरेलू चीनी स्टॉक और एथेनॉल के लिए गन्ने/चीनी के डायवर्जन की नीति।
अगर शुल्क-मुक्त आयात से बाजार में पर्याप्त अतिरिक्त चीनी पहुंचती है और सरकार की स्टॉक सीमा प्रभावी रहती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इसके विपरीत, यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है और त्योहारी मांग मजबूत बनी रहती है, तो कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
निष्कर्ष: मौजूदा चीनी महंगाई को केवल एथेनॉल नीति से जोड़ना सही नहीं होगा। एथेनॉल के लिए गन्ने/चीनी का डायवर्जन उपलब्धता को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन कम उत्पादन, मौसम, घटते स्टॉक और त्योहारी मांग भी कीमतों में तेजी के बड़े कारण हैं। सरकार अब आयात और स्टॉक नियंत्रण के साथ एथेनॉल डायवर्जन को संतुलित करने की दिशा में कदम उठा रही है।
