विशाखापट्टनम (ख़बरें investigative Desk):
आंध्र प्रदेश की आर्थिक राजधानी विशाखापट्टनम (वाइज़ैग) इन दिनों दोहरे जल-संकट के मुहाने पर खड़ी है। एक तरफ जहाँ शहर के आम नागरिक पीने के पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं और नगर निगम को टैंकरों का सहारा लेना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस तटीय शहर में तेजी से स्थापित हो रहे 6.5 गीगावाट (GW) क्षमता के विशाल AI और Data Center इकोसिस्टम के जल उपभोग को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
गूगल, अडानी और एमेजॉन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगामी प्रोजेक्ट्स से शहर में जहां आर्थिक क्रांति और नौकरियों की उम्मीद जगी है, वहीं इसके भारी जल उपयोग ने पर्यावरणविदों, स्थानीय निवासियों और नीति निर्माताओं के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
विशाखापट्टनम का वर्तमान जल संकट और बुनियादी ढांचा
विशाखापट्टनम शहर की दैनिक पेयजल मांग लगभग 480 मिलियन लीटर प्रति दिन (MLD) है, जबकि शहर को वर्तमान में केवल 410 MLD जल की ही आपूर्ति हो पा रही है। इस तरह शहर प्रतिदिन 70 MLD के घाटे का सामना कर रहा है।
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जलाशयों का गिरता स्तर: मुदसर्लोवा, मेघाद्रिगेड्डा, रायवाड़ा और येलेरू (Yeleru) जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से नीचे गिरा है।
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नागरिकों पर असर: अरिलोवा, मधुरवाड़ा और भीमुनिपटनम जैसे क्षेत्रों में नल से पानी आना लगभग बंद हो गया है। ग्रेटर विशाखापट्टनम नगर निगम (GVMC) वर्तमान में रोजाना 100 से अधिक टैंकरों के माध्यम से 400 से ज्यादा ट्रिप लगाकर पानी की आपातकालीन सप्लाई कर रहा है।
डेटा सेंटर्स की ‘जल-क्षुधा’: आंकड़ों का खेल
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा प्रोसेसिंग के लिए उपयोग होने वाले हाई-डेंसिटी सर्वरों को ठंडा (Cooling) रखने के लिए अरबों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। औसतन 1 मेगावाट (MW) का डेटा सेंटर कूलिंग टॉवर्स (Evaporative Cooling) के माध्यम से रोजाना लगभग 68,500 लीटर पानी खपत करता है।
| पैरामीटर | घरेलू नागरिक उपयोग | डेटा सेंटर इकोसिस्टम (6.5 GW प्रस्तावित) |
| दैनिक जल मांग / खपत | ~480 MLD | ~225 से 235 MLD (मौजूदा तकनीक से) |
| वार्षिक अनुमानित आवश्यकता | ~6.2 TMC | ~3 TMC (थॉउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट) |
| प्रतिद्वंद्व / प्रभाव | पेयजल की किल्लत और भूजल का दोहन | शहर के कुल नागरिक जल उपभोग का लगभग 35-40% |
शहर के नागरिक समूहों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं (जैसे ‘जल बिरादरी’) ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) भी दायर की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इतने बड़े पैमाने पर पानी के विपथन (Diversion) से शहर के प्राकृतिक संसाधन सूख जाएंगे।
सरकार का पक्ष: पोलावरम परियोजना और कूलिंग तकनीक
नागरिकों के विरोध और विधानसभा में उठे सवालों के बीच आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने स्थिति स्पष्ट की है:
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औद्योगिक जल आवंटन: डेटा सेंटर्स को पीने का पानी नहीं दिया जाएगा। इसके लिए पोलावरम परियोजना (Polavaram Project) के औद्योगिक आवंटन से 3 TMC पानी समर्पित पाइपलाइनों के जरिए लाया जाएगा।
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थर्मल पावर से तुलना: आईटी मंत्री के अनुसार, 1 GW का पारंपरिक थर्मल पावर प्लांट डेटा सेंटर की तुलना में 10 गुना अधिक पानी की खपत करता है।
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एडवांस एयर-कूलिंग: गूगल और अन्य टेक कंपनियों ने दावा किया है कि वे पूरी तरह से इवैपोरेटिव वाटर कूलिंग के बजाय एडवांस एयर-कूलिंग और लिक्विड-टू-चिप कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल करेंगे, जिससे पानी की खपत काफी कम हो जाएगी।
आगे की राह: संतुलन की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि विशाखापट्टनम को टेक-हब बनाने के लिए निवेश महत्वपूर्ण है, लेकिन बिना जल-सुरक्षा के यह विकास टिकाऊ नहीं होगा। इसके लिए सरकार को:
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डेटा सेंटर्स के लिए केवल एसटीपी (Sewage Treatment Plant) रीसाइकिल्ड वाटर या समुद्र के पानी से डेसालिनेशन (Desalination) को अनिवार्य करना चाहिए।
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वॉटर यूसेज इफेक्टिवनेस (WUE) के लिए सख्त मानक तय करने चाहिए।
